How to write an essay on Nationalism in Hindi | Rashtravad राष्ट्रवाद par HindiMe Nibandh

राष्ट्रवाद के विभिन्न प्रकार के मतवाद

राष्ट्रवाद एक ऐसी अवधारणा है जिसमे राष्ट्र सर्वोपरि होता है अर्थात राष्ट्र को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है | यह एक ऐसी विचारधारा है जो किसी भी देश के नागरिको के साझा पहचान को बढ़ावा देती है |

कसी भी राष्ट्र की उन्नति एवं प्रसन्नता के लिए नागरिकों में सांस्कृतिक धार्मिक और भाषाई विविधता के ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति गौरव की भावना को मजबूती प्रदान करना आवश्यक है और इसमें राष्ट्रवाद एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है |

राष्ट्रवाद के प्रकार का विकास

विदेशो में :-

राष्ट्रवाद का विकास स्प्रिंग ऑफ नेशन्स में 1848 में देखा जाता है

लेनन बेराइट के अनुसार राष्ट्रवाद एक राज्य द्वारा अपने हितों को सुरक्षा देना एवं पहचान बनाये रखने का आधार हो जिसमे उस राज्य के लोगो के हिट एक समुदाय की तरह हो |

राष्ट्रवाद का उदाहरण इटली एवं जर्मनी में एकीकरण से देखा जा सकता है तथा उसके बाद कुछ बड़े राज्यों का छोटे राज्यों में बदलना एवं उपनिवेशवाद से मुक्ति ही राष्ट्रवाद का मुख्या उदाहरण है जिसमे लैटिन अमेरिका अफ्रीका के देश , जापान , चीन आदि प्रमुख हैं जिन्होंने गुलामी की जगह अपना राष्ट्र को बनाए रखना, अपनी संस्कृति, धर्म को बचाने की प्राथमिकता दी |

भारत में राष्ट्रवाद का विकास

भारत में राष्ट्रवाद का विकास वैदिक काल से ही देखा जा सकता है |

विष्णुपुराण में राष्ट्र के प्रति श्रद्धाभाव का अधर्श मिलता है तो वहीँ वायुपुराण में भारत को कामभूमि बताया है | इसी तरह भागवतपुराण में विश्व की सबसे पवित्र भूमि को भारत बताया गया है और महाभारत में भारतवर्ष की महिमा का वर्णन मिलता है |

आधुनिक काल में भारत के राष्ट्रीय आंदोलनों में राष्ट्रकी सर्वोच्चता का सिद्धांत देखने को मिलता है जिसमे सभी लोगों उनकी संस्कृति, धार्मिक, भाषायी, आर्थिक विविधता के बावजूद एक साथ भाग लिया |

बाल गंगाधर तिलक स्वराज मेरा जन्मसिद्ध मई इसे रहूँगा तथा सुभाष चंद्र बोसे द्वारा “तुम मुझे खून दो.. में तुम्हें आज़ादी दूंगा ” और महात्मा गांधी द्वारा “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन, स्वराज का सिद्धांत में राष्ट्रवाद के लक्षण दिखाई पड़ते हैं |

भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण

उदय अनेक कारणों से हुआ जिसमे सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन प्रमुख थे | इन आन्दोलनों के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर किआ गया तथा राष्ट्रीयता की भाव भूमि तैयार की गयी | जिसमे ब्रम्ह समाज, आर्य समाज थिओसोफिकल सोसाइटी आदि की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी |

इनके माध्यम से भारत के लोगो ने आत्मविश्वास पैदा किआ तथा भारतीय संस्कृति की गौरव गरिमा का महत्त्व बताया | इसमे राजा राम मोहन राय इसके अग्रदूत जाने जाते हैं |

स्वामी दयाननद सरस्वती ने ईसाई धर्म की कमियों को उजागर किआ तथा स्वदेशी का नैरा दिए | उन्होंने कहा “भारत भारतीयों के लिए है” और वेदों की ओर लौटने को कहा

ब्रिटिश सरकार द्वारा सम्पूर्ण भारत पर नियंत्रण करके राजनितिक एकता स्थापित की गई ताकि उससे अंग्रेजों को प्रशासन चलाने में कठिनाई न हो |

इसी राजनितिक व प्रशासनिक एकता के कारण लोगों का संपर्क बढ़ा तथा राष्ट्रवाद का प्रचार प्रसार हुआ |

भारतीय उपन्यासों एवं ग्रंथों का अनुवाद अनेक भाषाओँ में हुआ जिसमे मनुस्मृति, अभिज्ञान शाकुंतलम आदि प्रमुख थे जिस से विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ और इससे राष्ट्रवाद के तत्त्व को मजबूती प्रदान की जिसमे थिओसोफिकल society के संस्थापक ऐनी बेसेंट ने की जिसने भारतीय स्वतंत्रता में एक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया |

भारत में पश्चिमी शिक्षा के प्रसार किआ गया ताकि अंग्रेजों को ऐसे प्रशासक मिलें जो रंग एवं रूप में भारतीय हो लेकिन आचार विचार एवं रूचि में अंग्रेज हो |

इसी क्रम में भारतियों को रूसो, वालटेयर, हंगरी आदि प्रमुख विचारको के साहित्यों का ज्ञान हुआ एवं उनमे राष्ट्रवाद का प्रसार हुआ जिससे उनमे राष्ट्रीय आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया |

इसी प्रकार समाचार पत्रों व साहित्यों का प्रकाश, धन की निकासी का सिद्धांत, वि औद्योगीकरण, आर्थिक शोषण की व्यवस्था, कृषि का वाणिज्यीकरण, आर्थिक शोषण की व्यवस्ता, क्रृषि का वाणिज्यीकरण ( खाद्यानों की अनुपलब्धता ) , कर बोझ, ज़मीदारी प्रथा, रेलवे का विस्कस आदि के कारन लोगों के मन में असंतोष हुआ जिससे राष्ट्रीयता को बढ़ावा मिला |

इस तरह राष्ट्रवाद के जन्म के कारणों से यह स्पष्ट है की भारत में इसका जन्म ब्रिटिश सर्कार की नीतियों के प्ररिणामस्वरूप हुआ |

ब्रिटिश शासन ने भले ही भारत में राजनितिक एकता स्थापित की हो, पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार किया, यातायात के संचारों का विकास हुआ |

इससे ब्रिटिश सर्कार को भले ही लाभ हुआ हो परन्तु इसके अप्रत्यक्ष रूप ने “राष्ट्रीयता” के विकास में योगदान दिया | और इसके प्रकिक्रियावादी स्वरूप ने इसको और तेज कर दिया |

भारत विदेशों में राष्ट्रवाद की तुलना :

कुछ विद्वानों के अनुसार पश्चिमी राष्ट्रवाद ( यूरोप ) एक देशज प्रक्रिया से निकलने के कारण कही अधिक सांस्कृतिक है जबकि पूर्वा राष्ट्रवाद ( भारत ) उपनिवेशवाद विरोधी राजनितिक आंदोलनों के हाथों गढ़े जाने के कारण मूलतः राजनितिक है |

पूर्वी राष्ट्रवाद पर पप्रजातीय, जातीय व सांस्कृतिक पहलू हावी है तो उनके पीछे उपनिवेशवाद की भूमिका है जिसकी जिम्मेदारी पश्चिम पर डाली जानी चाहिए |

भारत समेत ऐसे कई समाज है जो पारम्परिक रूप से धार्मिक, सांस्कृतिक एवं भाषाई विविधता से संपन्न हैं, ऐसी परिस्थिति में कभी तो राष्ट्रवाद बहुलताओं के बीच परस्पर संसक्ति के सूत्र का काम करता है और कभी उपराष्ट्रीयताओं के बीच हिंसक राष्ट्रवाद का अनुभव पश्चिमी अनुभव से लाजमी होना तय है |

राष्ट्रवाद की विभिन्न अवधारणाओं एवं असल स्वरूप :-

राष्ट्रवाद की परिभाषा व अर्थ को लेकर व्यापक चर्चाएं होती रही हैं | प्रोफेसर सवाईडर के अनुसार इतिहास के एक विशेष चरण पर राजनितिक, सामाजिक, आर्थिक व भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाले ऐसे व्यक्तियों के समूह की एक मनः स्थिति, अनुभव या भावना है जो सामान भाषा बोलते हैं, जिनके पास एक साहित्य है जिसमे राष्ट्र की अभिलाषाएं अभिव्यक्त हो चुकी हैं, जो सामान परम्पराओं व सामान रीती रिवाजों से सम्बन्ध है जो अपने वीर पुरुषों की पूजा करते हैं और कुछ स्थितियों में सामान धर्म वाले हैं |

राष्ट्रवाद के प्रतिपादक, जॉन गॉटफ्रेड इर्डर थे जिन्होंने इस शब्द का पहली बार प्रयोग कर जर्मन राष्ट्रवाद की नींव डाली |

इसके अनुसार, राष्ट्र केवल सामान भाषा, नस्ल, धर्म या क्षेत्र से बनता है किन्तु जब भी इस आधार पर समरूपता स्थापित करने की कोशिश की गई तो तनाव व उग्रता को बल मिला |

राष्ट्रवाद जब चरम मूल्य बन जाता है तो सांस्कृतिक विविधता के नष्ट होने का संकट उठ खड़ा होता है |

राष्ट्रवाद – राष्ट्र + वाद | “राष्ट्र” लोगों के किसी समूह की उस आस्था का नाम है जिसके तहत बे खुद को साझा इतिहास, परंपरा, भाषा और संस्क्तिति के आधार पर एकजुट मानते हैं |

इन्ही बंधनों के कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं की उन्हें आत्म निर्णय के आधार पर राजनितिक समुदाय अर्थात “राष्ट्र” की स्थापना करने का आधार है |

हालाँकि दुनिआ में ऐसा कोई राष्ट्र नहीं है जो इन कसौटियों पर पूरी तरह फिट बैठता हो, इसके बावजूद पृथ्वी की एक एक इंच जमीन राष्ट्र के आधार पर बना राष्ट्र उस समय तक कल्पनाओं में ही रहता है जब तक उसे एक राष्ट्र का रूप नहीं दे देता |

राष्ट्रवाद : अच्छा या बुरा

राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों का अपने अपने राष्ट्र का अस्तित्व स्वाभाविक, प्राचीन, चिंतन व स्थिर लगता है |

इस विचार से तथा इस आधार पर बने राष्ट्रीय समुदाय वर्गीय, जातिगत एवं धार्मिक विभाजनों को भी लांघ सकते हैं |

राष्ट्रवाद के आधार पर बने कार्यक्रम और राजनैतिक परियोजनाओं के हिसाब से जब किसी राष्ट्र राज्य की स्थापना हो जाती है तो उसकी सीमाओं में रहने वालों से यह अपेक्षा की जाती है की वे विभिन्न अस्मिताओं के ऊपर राष्ट्र के प्रति निष्ठा को अहमियत देंगे |

वे राष्ट्र के कानून का पालन करेंगे और इसकी आतंरिक व बाहरी सुरक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी देंगे |

राष्ट्रवाद अनिवार्य तौर पर किसी न किसी कार्यक्रम और परियोजना का वाहक होता है जबकि देशभक्ति की भावना ऐसी किसी शर्त का मोहताज नहीं होती |

राष्ट्रवाद बड़े बड़े साम्राज्यों के पतन में भी सहयोगी रहा है |

यूरोप में 20 वी शताब्दी में ऑस्ट्रिया, हंगरी व् रूसी साम्राज्य तथा इनके साथ ऐसा व अफ्रीका में ब्रिटिश, फ़्रांसिसी, डच व पुर्तगाली साम्राज्य के विघटन के मूल में राष्ट्रवाद ही था |

भारत व अनेक भूतपूर्व उपनिवेशों में औपनिवेशिक शासन से स्वतन्त्र होने के संघर्ष भी राष्ट्रवादी संघर्ष थे | ये संघर्ष विदेशी नियंत्रण से स्वतन्त्र राष्ट्र राज्य की स्थापना की आकांक्षा से प्रेरित थे |

राष्ट्रवाद में धर्म को राष्ट्र के बुनियादी आधार पर मान्यता प्राप्त नहीं है फिर भी भाषा के साथ साथ धर्म के आधारों पर राष्ट्र की रचना हुई है |

राष्ट्रवाद ने वैश्विक मामलों में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है | राष्ट्रवाद के सम्मोहक राजनितिक सिद्धांत इस्तिहास रचने में योगदान दिया है |

इसने जनता को जोड़ा है तो विभाजित भी किया है | इसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाने में मदद की |

राष्ट्रवादी संघर्षों ने राष्ट्रों व साम्राज्यों की सीमाओं के निर्धारण व पुनर्निर्धारण में योगदान दिया है |

राज्य की सीमाओं के सुदृढ़ीकरण के साथ स्थानीय निष्ठाएं एवं बोलियां भी राष्ट्रीय निष्ठाओं व सर्वमान्य जनभाषाओं के रूप में विकसित हुई |

नए राष्ट्र के लोगों ने एक नई राजनीतिक पहचान अर्जित की जो राष्ट्र राज्य की सदस्यता पर आधारित थी |

राष्ट्रवाद को चुनौतियाँ :-

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद को काफी बड़ी चुनौती दी है | आज दुनिया का एक प्रमुख वर्ग एक तरह की यात्राएं, एक सा भोजन करता है | इनके लिए राष्ट्रीय सीमाओं के कोई ख़ास मायने नहीं रह जाते हैं |

आर्थिक भूमंडलीकरण, बड़े पैमाने पर होने वाली लोगों की आवाजाही, इंटरनेट व मोबाइल फ़ोन जैसी प्रोद्योगिकइयों की प्रगति ने दुनिया के फासलों को बहुत ही कम कर दिया है |

ऐसे लोग बढ़ते जा रहे हैं जो अपने देश और सांस्कृतिक माहौल से दूर काम एवं जीवन की सार्थकता की तलाश में जाना चाहते हैं |

मार्कस्वादिओं द्वारा दुनिआ भर के मजदूरों का एक होने का नारा राष्ट्रवाद की भावना के प्रतिकूल साबित होता है | इसके अनुसार राष्ट्रवाद पूँजीवाद के विकास में एक सहयोगी बन कर उभरा है | इन्होने वर्ग विभाजन से परे जाकर राजनितिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता करने वाली किसी परिघटना को तरजीह नहीं दी |

आज भी मार्क्सवादी, नक्सलवादी विचारधारा के लोग राष्ट्रवाद के लिए एक चुनौती हैं |

राष्ट्रवाद का आज राजनीतिकरण हो चुका है | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसने भारत की स्वतंत्रता, लोकतंत्र एवं एकता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, भारत पर लगभग 45 वर्षों तक शासन किया |

भारतीय जनता पार्टी द्वारा हिन्दू संस्कृति की सुरक्षा एवं विकास में योगदान देना तथा भारतियों के मन में “पाकिस्तान व चीन” के खिलाफ भारत की राष्ट्रीयता विकसित की जा रही है |

इसी तरह अकाली दल में सिखों का प्रभुत्व, शिव सेना में मराठों का प्रभुत्व, “उल्फा” के विरुद्ध असम गण परिषद इत्यादि का उदय ने राष्ट्रवाद को राजनीती से जोड़ दिया |

भारत में दुनिया की तीसरी बड़ी सेना होना, रक्षा बजट 23 बिलियन डॉलर होना, सेना का लगातार युद्धाभ्यासों, समझौतों, परमाणु ऊर्जा का प्रयोग, मिसाइल में परीक्षण, अनुसन्धान के द्वारा आधुनिकीकरण होना राष्ट्रवाद की संकल्पना को जीवित रखता है |

इसी प्रकार हॉन्ग कॉन्ग में आंदोलन, फिलिस्तीन में राष्ट्रीय आत्म निर्णय आंदोलन, ईस्ट तिमूर की आज़ादी राष्ट्रवाद को बनाये रखने में कारगर साबित हुई |

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